जो इम्यून सिस्टम शरीर की ढाल होता है, वही अगर शरीर का दुश्मन बन जाए तो क्या होगा? डॉ दुर्गेश श्रीवास्तव (Consultant Rheumatologist Lucknow) का कहना है कि ल्यूपस ठीक ऐसी ही एक क्रॉनिक ऑटोइम्यून बीमारी है। यह जोड़ों, त्वचा, किडनी और फेफड़ों समेत शरीर के कई अहम अंगों को धीरे-धीरे नुकसान पहुंचाती है, लेकिन सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि यह पुरुषों के मुकाबले महिलाओं को कहीं ज्यादा निशाना बनाती है।
डॉ दुर्गेश श्रीवास्तव (Consultant Rheumatologist Lucknow) बताते हैं कि दुनियाभर में ल्यूपस के कुल मामलों में से 90% केवल महिलाओं, खासकर 15 से 44 वर्ष की आयु, में देखे जाते हैं। आखिर महिलाओं में ही इस बीमारी का जोखिम इतना ज्यादा क्यों है? आइए इसके पीछे छिपे कारणों को समझते हैं।
डॉ दुर्गेश श्रीवास्तव (Consultant Rheumatologist Lucknow) बताते हैं कि महिलाओं में एस्ट्रोजन हार्मोन का स्तर पुरुषों की तुलना में ज्यादा होता है, खासतौर से उनकी रिप्रोडक्टिव एज (15-44 वर्ष) के दौरान। इसी समय में ल्यूपस के सबसे ज्यादा मामले दर्ज किए जाते हैं। पीरियड्स, प्रेग्नेंसी और मेनोपॉज के दौरान होने वाले हार्मोनल बदलाव इम्यून सिस्टम की एक्टिविटी को प्रभावित कर सकते हैं, जो महिलाओं में ल्यूपस के लक्षणों को ट्रिगर कर सकते हैं। हालांकि, अभी तक कोई ठोस सबूत नहीं मिले हैं कि एस्ट्रोजन हार्मोन ल्यूपस का सीधा कारण है।
ल्यूपस की शुरुआती पहचान मुश्किल होती है क्योंकि इसके लक्षण बहुत सामान्य होते हैं। बहुत थकान, जोड़ों में दर्द, बुखार, बालों का झड़ना, रेशैज और याददाश्त में कमी जैसे लक्षण कई अन्य कारणों से हो सकते हैं। इसलिए अगर इनमें से कई लक्षण बार-बार उभर रहे हों, तो डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है।


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